Rock Song : चूर चूर अभिमान

आपने किसी ढाबे में या घर में.. चूर-चूर नान या रोटियाँ तो ख़ूब खाई होंगी.. लेकिन क्या कभी अपने अंदर मौजूद अभिमान को चूर-चूर करने की कोशिश की है ? इस कॉन्क्रीट को तोड़ने की कोशिश की है ? शायद नहीं की होगी… असलियत में इस बात पर कभी ध्यान ही नहीं गया होगा कि… read more

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UnDress Nirvana : मुक्तिबोध

I think everyone feels this everyday! Read and Comment कहीं से वापस घर आकर कपड़े उतारकर अलमारी में टाँगते हुए शरीर छोड़ने का एहसास होता है बिलकुल आत्मा और शरीर के विच्छेद की तरह एक पूरे दिन का बोझ कंधों से अल्मारी की खूंटी की तरफ बहने लगता है शायद इसीलिए कपड़े उतारे बग़ैर थकान… read more

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Satellite : चांद निकलता है तो मैं और तुम जुड़ जाते हैं

This Poem explores Moon as a communication satellite between Human Bodies, Human Souls and Human thoughts. दर्द और खुशी जब अंगड़ाई लेते हैं तो चिटकती है रात पूरी कायनात और तमाम चेहरे अपने से उड़ते हैं जुगनुओं की तरह लेकिन नज़र आसमान में चांद को ढूंढती है और उससे चिपक जाती है चांद निकलता है… read more

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Arrows Continued : दैनिक दशानन

जलकर, भस्म होकर फिर से खड़ा हो जाता है नाभि में तुम्हारे तीर का स्वागत करने के लिए दशानन थक नहीं रहा इसलिए तुम्हें भी मर्यादाओं की प्रत्यंचा बार बार चढ़ानी होगी बार बार भेदना होगा लक्ष्य कि तुम भी थक नहीं सकते अब हर रोज़ नये रावण हैं नयी विजयदशमी है हर रोज ©… read more

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Rubik’s Cube : नाज़ुक नौकरियाँ

दफ़्तर की इमारत बिलकुल रूबिक्स क्यूब जैसी थी.. उसके शक्तिशाली कमरे हर वक़्त विस्थापित होते रहते थे.. उन कमरों में रहने वाले लोग ये सोचते रहे.. कि सत्ता उनके तशरीफ़ के नीचे दबी रहेगी.. उनका कमरा एक राजमहल की भाँति.. भय-मिश्रित आदर भावना को प्राप्त करता रहेगा शायद वो भूल गये थे कि वो एक… read more

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SidTreenium : Self Portrait of an Element

सेल्फ पोर्ट्रेट यानी अपना शब्द चित्र बनाने की कोशिश की है। बहुत समय पहले, मूलत: अंग्रेज़ी में लिखी थी। सोचा था अपने जन्मदिन के दिन ही इसे पोस्ट करूंगा.. आज वो वक़्त आ गया है। Caffeine fighting with my dropping eyelids, shrapnel on the periphery of my eyes.. poison of Nux Vomica in my head..… read more

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आज तुममें कुछ नया है : Subscription Renewed

भेस बदलकर आया करो हर रोज़ अनजान लोगों से मिलना अच्छा लगता है कच्ची मिट्टी बनकर घूमा करो मेरे चाक पर हाथ से ढालना तुम्हें सच्चा लगता है हर बार नया होकर फिर पुराना हो जाना नित अंदर दौड़ता कोई बच्चा लगता है © Siddharth Tripathi ✍️SidTree

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Restart.. ‘Rest’ is ‘Art’ : विध्वंस होते रहने चाहिएँ

आपके जीवन में हर रोज़ कुछ न कुछ टूटता और छूटता होगा.. ये अतिसूक्ष्म विध्वंस हैं, जिनकी हम सबको आवश्यकता होती है। मानव सभ्यता को बार बार नया और पुनर्जीवित करने के लिए ये विध्वंस एक उत्प्रेरक यानी Catalyst का काम करते हैं। मूल विचार ये है कि विध्वंसों की ज़रूरत क्या है ? और… read more

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Soil-mates : किस मिट्टी के बने हो ?

बातचीत के दौरान अक्सर कहा जाता है – किस मिट्टी के बने हो.. इसका जवाब हर किसी के लिए अलग अलग हो सकता है.. फिर भी एक धागा है.. जो सारे जवाबों को सिल सकता है। रेडियो को ट्यून करते हुए एक साथ दो frequencies को सेट करना संभव नहीं है.. लेकिन संभव और असंभव… read more

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आज़ाद आवाज़ : Free Speech

आज़ादी एक ऐसा शब्द है जिसका विस्तार अनंत है, और इस विस्तार में कई बार सैकड़ों भाव और स्थितियां समाहित हो जाते हैं। आज़ादी के संदर्भ में देखें तो हर एक पल की अपनी अलग-अलग स्वतंत्रता है। एक ही दिन में आप कई बार खुद को आज़ाद महसूस करते हैं और बहुत बार खुद को… read more

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