Locked Life : सुरक्षित जीवन

मन में मिसाइल चलाते हैं… नींद में निशाने लगाते हैं.. चाबी किसी और के पास होती है.. कुंडी पर लटके रह जाते हैं..

कौन ?

वही… ज़ंग खाए ताले… सुरक्षित जीवन वाले

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बारूद जलता है..  हम खुश होते हैं
मिसाइल उठती है पड़ोस के दुश्मन की तरफ…
और चोट सोखने वाले हल्दी के दूध के हर घूंट में.. वीर रस आने लगता है..

कोई किसी को ललकारता है…
नामोनिशान मिटाने की प्रतिज्ञा करता है
और अंदर का योद्धा… तोंद संभालते हुए.. डकार लेकर उठ खड़ा होता है..
उद्घोष करता है.. हम भी तैयार हैं..

कोई आग कभी नहीं जला पाती.. इन हाथों को
खीरा.. टमाटर.. सलाद काटते हुए
बार बार करीब से गुज़रती है चाकू
उंगलियां हर बार बच जाती है..

ये सुरक्षित जीवन है
रंगहीन हो.. गंधहीन हो.. तो भी..
सुविधा की मदिरा से नाक तक भरा है..
और वो मदिरा.. हर बात पर छलकती है

© Siddharth Tripathi ✍️ SidTree

2 Replies to “Locked Life : सुरक्षित जीवन”

  1. सभार।

    हमारी अक़्ल पर ताले पड़े हैं
    खंडर है ज़ेहन और जाले पड़े हैं

    ब-ज़ाहिर साफ़ आते हैं नज़र दिल
    मगर अंदर से ये काले पड़े हैं

    कभी देखो पलट कर आस्तीं को
    कई ही साँप हम पाले पड़े हैं

    मयस्सर कैसे हो दो वक़्त रोटी
    कि जब इक वक़्त के लाले पड़े हैं

    करें ख़ुद ही ख़िज़ाओं के हवाले
    चमन के ऐसे रखवाले पड़े हैं

    बहुत रोया जुदा हो कर वो शायद
    तभी तो आँख में हाले पड़े हैं

    दहकते रास्ते पर चल पड़े थे
    अभी तक पाँव में छाले पड़े हैं

    लुटा सकते हैं उल्फ़त में वो जानें
    बहुत ऐ ‘साद’ मतवाले पड़े हैं

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