Wireless एकांत में हम-तुम कैसे है ?

आपदा, महामारी, संक्रमण के असर.. अजीब होते हैं.. जैसे कोई व्यंजन बन रहा हो.. और उसे बनाने की रेसिपी में लिखा हो…

“समाज के छिलके-कूड़ा-करकट माने जाने वाले गरीब-भूखे-मजबूर-बेरोज़गार पहले अलग निकाल लीजिए.. ना निकले तो पानी में भिगोकर छोड़ दीजिए.. थोड़ा समय बीतने पर छिलका अलग हो जाएगा.. और समाज का संपन्न हिस्सा तैयार हो जाएगा.. थोड़ी गर्मी, आग झेलने के बाद लज़ीज़ बनने के लिए…

हम हों.. या तुम.. सब वायरलेस हैं आजकल.. अदृश्य बंधनों में बंधे हुए..
अपने अपने लॉग-इन और पासवर्ड के साथ सुरक्षित अपने कोटरों में.. महामारी से उपजे अकेलेपन का सारा दोष वायरस पर थोपकर.. ये सोच रहे हैं कि ये मजबूरी खत्म कब होगी ?

ये मजबूरी सच्ची है.. लेकिन सच तो ये भी है कि आज जो हालात हैं.. वही पहले भी थे… बस चहल पहल खत्म हो गई है.. अपने में गुम.. प्रजाति तो वही है… इस WiFi प्रजाति को एक वायरस ने झकझोरा है… नया उद्देश्य दिया है.. और अब तक के कर्मों के फलस्वरूप शाप दिया है… शाप कोई दैवीय आदेश नहीं होता.. शाप, कर्मों की श्रृंखला से उपजा काँटा है.. जो क्रूरता के पथ पर देर तक चलने के बाद चुभता है। शायद मनुष्यता को भी ये वायरस काँटे की तरह चुभ गया है।

दो कविताएँ हैं.. एक भाव-चित्र बनाए जाने का वीडियो है मौलिक आवाज़ और संगीत के साथ.. ये दौर आत्म अवलोकन और विश्लेषण का है.. दुनिया बदलने वाली है… वायरस ने लकीर खींच कर समय को बाँट दिया है.. BC यानी Before Corona और AC यानी After Corona में

WiFi Species 🦠 : वाई-फ़ाई प्रजाति

 

सृष्टि ने हर जीव को संगरोध (क्वारंटीन) में रखा
हम सब अकेले थे, हम सब अनोखे थे
फिर हम जीवन के रस में
असंख्य वायरस, बैक्टीरिया, पेड़-पौधे, पशु पक्षियों
और कुछ चुने हुए इंसानों के साथ गूँथे गये
घर के साझे चूल्हे में पके
झूमती हुई गली से
बतियाता हुआ मोहल्ला बने
हैसियत बढ़ी तो बेफ़िक्र समाज बने
और लटक गये वाई-फ़ाई से
एकदम सुन्न होकर

अब एक ज़िंदा वायरस ने
वाई-फ़ाई प्रजाति को झकझोरा है
नया उद्देश्य दिया है

Thorn of Curse 🦠 : शाप का कांटा

भीड़ की ताकत दिखाई है युद्धों ने
भीड़ का अकेलापन विषाणु ने दिखाया है
शहरों ने चुपचाप मृत्यु का गीत गाया है

आँकड़ों के कोलाहल में…गहरा सन्नाटा..
दरवाज़ा तोड़कर.. घर में घुस आया है
सभ्यता ने चुपचाप अपना सिर झुकाया है

तरकीबों के तरकश में.. रखे रह गये सैकड़ों बाण
सत्ताएँ बस बग़लें झांकती.. निकलते जा रहे हैं प्राण
चीख़ों के महासमुद्र से.. एक हाथ उठकर आया है
शाप में समाज ने अकेलापन पाया है

© Siddharth Tripathi ✍️

6 Comments

  1. ये वाकई मेंं वाई फाई वाली दुनिया के लिए बड़ा सवाल है। ऐसा लगता है जितना किया वो सब अधूरा है। बहुत गहरा संवाद है सर….बार-बार पढ़ा तब जाकर समझ आया

  2. सत्ता किंकर्तव्यविमूढ़
    शोकगीत में डूबा समाज
    विषाणु की शक्ति…आईना बन गयी…जिसमे अपनी अपनी पूर्ण शक्ति के साथ सब बेहद कमजोर निकले।

  3. क्या बात है सर्,
    सच है
    हम हों.. या तुम.. सब वायरलेस हैं आजकल.. अदृश्य बंधनों में बंधे हुए
    बहुत सही लिखा है
    भीड़ का अकेलापन विषाणु ने दिखाया है

  4. सर, शब्द नहीं आपके शब्दों की तारीफ़ के लिए बस इतना कह सकती हूं इससे बेहतर कोई लिख नहीं सकता🙏🏻

  5. सत्य है.. “शाप में समाज ने अकेलापन पाया है” 🙏

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