Half Burnt Notebook : आधी जली हुई नोटबुक

हिंसा में आंसू तो होते हैं.. पर कई बार गहरा कटाक्ष भी होता है.. संताप होता है और क्रूरता का समारोह भी होता है..

हिंसा के तीन दिवसीय आयोजन के बाद एक आधी जली नोटबुक मिली है.. इसके कई पन्ने जले हुए हैं.. जितनी बची है..उतने से काम चलाना होगा.. जिसकी भी हो.. आकर नज़दीकी थाने से ले जाए… व्यवस्था के सौजन्य से एक प्रति यहां रखी गई है.. पढ़ने में 5 मिनट खर्च हो सकते हैं

पहला पन्ना

हवा के झोंके..
घरों के चिराग़ों को..
बुझाते चलते हैं
मोहल्ले जलते हैं
सब हाथ मलते हैं

चौथा पन्ना

बचपन में किसी की उँगली पर ब्लेड छू जाए.. किचन का चाकू लग जाए.. तो माँ दौड़ पड़ती है… अपने बच्चे को कलेजे से लगाने के लिए.. स्नेह का सागर उड़ेल देती है.. लगाती है तरह तरह के लेप..

एक बड़े शहर के दंगे में..
एक बच्चे पर चाकू से 400 वार हुए.. उनमें से पहला वार ख़बर बनकर आया था.. और बाकी के 399 वार.. एक माँ के कलेजे पर ही हुए.. माँ का धर्म नहीं होता

5वाँ पन्ना

हाथ में हथियार लेकर बदहवासी में दौड़ रहे.. एक जूते का निशान है नोटबुक पर.. इस जूते में किसी इंसान का पैर होगा..या नहीं ? ये रिसर्च का विषय है…

7वाँ पन्ना

दंगों में सामान महँगा हो जाता है
और इंसान सस्ते हो जाते हैं
ज़ख्म मुफ़्त में मिलते हैं

9वाँ पन्ना

पड़ोसी का घर अचानक जलने लगा… और चीखें… तीन घर छोड़कर रसोई में पक रहे व्यंजन की खुशबू में अतिक्रमण करने लगीं.. वहीं किसी ने कहा.. खिड़की दरवाज़े बंद कर लो..

12वाँ पन्ना

कहीं से कुछ आकर गिरा और हमारी पुश्तैनी दुकान जल गई… आधी उमर हो गई उनको यहां से सामान ख़रीदते हुए.. तब कभी नहीं लगा कि कोई फर्क है.. आज लग रहा है कि फर्क हमेशा था.. बस छिपा हुआ था मुस्कानों के पीछे..

15वाँ पन्ना

हम मिलकर रहे तेल और पानी की तरह..
तेल ऊपर ही तैरता रहा..
पानी उछाल मारता रहा बार बार..
तेल में आग लगी तो पानी को महसूस नहीं हुआ
और पानी की ऑक्सीजन ख़त्म होने से तेल को कोई फर्क नहीं पड़ा…
दोनों की फ़ितरत के अणु स्वीकार नहीं कर पाए एक दूसरे को…
तेल-पानी के विभाजन की ये लकीर इसीलिए मिटी नहीं शायद..

20वाँ पन्ना

कोई किसी को माफ़ नहीं करेगा… आजीवन अपने जले हुए घर और आत्मसम्मान की दुर्गंध ढोएगा.. इस नये समाज ने किसी को हारना, झुकना, सहना… सिखाया ही नहीं… जहां सब जीतते हैं.. वहां जीत के उत्सव नहीं होते… सिर्फ जीत का ख़ालीपन होता है…

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आखिरी पन्ना

Hell Rythm – प्रतिशोध की धुन

संवाद

आँखों में आंसुओं और खून का मिश्रण लिए हुए उसने पूछा –
“तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हो गया”

ये सुनते ही विजेता के अट्टहास में घुली उदासी बाहर आ गई
उसके क्षणिक सुख.. कुंडी खोलकर बाहर निकल गये…
और मुँह से निकला…

ये धुन याद है तुम्हें ?
शायद ना हो… क्योंकि तुम डरती थीं,
घबरा जाती थीं
मन की हिंसा को ज़रा सा छूते ही,

क्योंकि इस धुन में क्रूरता का समारोह है,
बदला लेने के बाद के सुकून में डूबी आवाज़,
साँस और ख़ून बाहर निकलते हुए,
खुली आँख से देखे हुए दुनिया के सारे दृश्य..
उन्हीं आँखों से बाहर उड़ते हुए,

जब भी किसी का कोई प्रतिशोध पूर्ण होता है
तो यही धुन बजती है।
और इस धुन के अंतिम छोर पर
बदले के साथ पैदा हुआ ख़ालीपन है,
और ये कोई निर्वात नहीं है..
इसमें ग्लानि की एक नदी बह रही है।
हर विजय में ये धुन
एक शोक के रूप में मिली हुई है

© Siddharth Tripathi ✍️ SidTree

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