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LED : Love Emitting Diode / प्रेम प्रकाश / The Hum-सफ़र Project

प्रेम प्रकाश किसी फिल्मी किरदार का नाम नहीं है… जिस तरह LED यानी Light Emitting Diode से रोशनी निकलती है.. उसी तरह प्रेम को संसार में प्रक्षेपित करने वाला कोई Love Emitting Diode भी होता होगा जो इंसानों के अंदर फिट रहता है.. इसे हिंदी में प्रेम प्रकाश कह सकते हैं 😂 । वैसे दोनों में फर्क है.. एक से रोशनी निकलती है और दूसरे से मोहब्बत। जब किसी इंसान से प्रेम और करुणा का ज़रा सा भी प्रक्षेपण न हो.. तो समझ लीजिए कि उसका Love Emitting Diode.. क्रोध और घृणा के अतिरिक्त वोल्टेज से फुक गया है। और इसे ठीक करने.. क्रियान्वित करने का नाम है.. The Hum-Safar Project..

ये नाम थोड़ा अंग्रेज़ी टाइप है.. लेकिन मायने ख़ालिस देसी हैं.. The Hum-Safar Project का अर्थ ये है कि हम सफ़र पर हैं… और इस सफ़र में हर दूसरे मोड़ पर संवाद के टुकड़े हैं.. इनमें नायक नायिका के प्रतीकों को किसी भी कोण से देखा जा सकता.. कोई भी संवाद पुरुष और स्त्री दोनों का हो सकता है.. इन्हें अंग्रेज़ी में Pieces of Prose और हिंदी में गद्य-अंश भी कह सकते हैं। ख़ैर तकनीकी नामकरण में घुसने की ज़रूरत नहीं है। इन संवादों में हमसफ़र आपकी यात्रा का साक्षी है।

इन्हें पढ़ते हुए आपको लगेगा कि सुनना, सुन पाना और सुन लेना भी प्रेम ही है। किसी की बातों की किरच को और यात्रा के छालों को, दिल की रूई में सोख लेना भी एक अग्नि परिक्रमा के समान है। जब हमसफ़र एक दूसरे की भावनाओं को निचोड़ते हैं तो ज़िंदगी की बूँदें निकलती हैं।

      1. मेरा गहरा प्रेम, तुम्हारी आवाज़ का प्यासा है
      2. हर प्रेम में तन्हाई की ज़रूरत है
      3. प्यार बढ़ता है एक दूसरे का जूठा पीने से
      4. तुम ही कह दो विजयी भव: !
      5. आंसुओं का मारा खारा शहर !
      6. तुम्हारा होना भी एक उच्चारित मंत्र है
      7. तुम्हारे साम्राज्य में मेरी आराम कुर्सी

यूँ तो हमसफ़र कोई प्रोजेक्ट नहीं होता.. लेकिन हमसफ़र के साथ संवाद की संभावनाओं को संजोना एक प्रोजेक्ट है। इसे पढ़िए.. और भावनाओं में थोड़ा उबाल आने दीजिए।


मेरा गहरा प्रेम, तुम्हारी आवाज़ का प्यासा है

उसने कहा –

क्या मुझे चाहने की कोई वजह है तुम्हारे पास ?

उसके हमसफ़र ने कहा –

शुक्रिया वो मुझे सहता रहा,
बुरे वक़्त में साथ बहता रहा,
मेरे अंदर कितना कुछ था कहने को,
उसे सामने बैठाया..कहता रहा


हर प्रेम में तन्हाई की ज़रूरत है

उसने कहा –

मेरे अंदर कुछ बदल रहा है.. हमें थोड़े से फ़ासले की ज़रूरत है.. फिर मिलेंगे.. पर कब मिलेंगे.. पता नहीं.. अगली मुलाक़ात कभी बग़ल के मकान सी लगती है… कभी आसमान में घटते-बढ़ते चाँद सी लगती है।

उसके हमसफ़र ने कहा –

जिस हवा को पत्ते नहलाते हैं
उसमें तुमको भिगोना हो तो ?

एक शाम सबसे तुम्हें चोरी करना
थोड़ा रंगना हो तो ?

खिलखिलाना
मुस्कान लुटाना
बाँहों के छल्ले बनाना
सफ़र दो पहियों का हो तो ?

या किसी बाज़ार में तनहा लुढ़कना
फँसी हुई उँगलियों के बीच
रिश्तों की राख ढूँढना हो तो ?

मेरे तुम्हारे साथ में अगर..
ये फ़ासला.. ये तन्हाई भी हो तो ?
सच में… यही पूरा प्रेम होगा


प्यार बढ़ता है एक दूसरे का जूठा पीने से

उसने कहा –

अब पहले की तरह हमारे बीच बात नहीं होती
ऐसा लगता है कोई बात नहीं बची करने को…

उसके हमसफ़र ने कहा –

लफ़्ज़ तेरे मेरे बीच के
उड़ चुके, कट चुके
छूट चुके बच्चों के हाथों में
अब हम अपनी अपनी खामोशी
एक ही गिलास में मिलाकर
पी रहे हैं, जी रहे हैं

किसी ने कहा था
प्यार बढ़ता है
एक दूसरे का जूठा पीने से
आजकल हम मौन पी रहे हैं.. एक दूसरे का..


तुम ही कह दो विजयी भव: !

उसने कहा –

मेरे अंदर क्रोध ही क्रोध भरा हुआ है… इससे छुटकारा चाहिए… तुम्हारी नरमी मेरी आग को साध सकती है.. मुझे विजय का बोध दे सकती है.. मुझे थोड़ा सह लो.. तुम ही कह दो विजयी भव:

उसके हमसफ़र ने कहा –

कोशिश करो
कि ये क्रोध दुख में बदल जाए..
बहकर हृदय की ज़मीन को थोड़ा मुलायम बना दे
फिर कोई पौधा उठे
उचककर देखे
सुबह आंखें मलते हुए
धीरे धीरे सोख ले
चारों तरफ की रोशनी
आबो हवा..
आंसू दूसरों के भी

नई ज़िंदगी का निर्माण..
शायद इस क्रोध से ही संभव हो


आंसुओं का मारा खारा शहर !

उसने कहा –

थोड़ी देर रो लेने दो… फिर तो सब पहले जैसा हो जाएगा !

उसके हमसफ़र ने कहा –

इन आंसुओं को बचाकर रखो..
किसी दिन फूल खिलाने के काम आएंगे…
एक दिन आएगा
जब खारे पानी से सींचे गये फूल उगा करेंगे।
और उनकी खुशबू नमकीन हुआ करेगी…
समंदर को शहर में बुलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी उस रोज़…
तब हर शहर मुंबई होगा

मेरा शहर हो या तुम्हारा शहर,
आंसुओं का मारा खारा शहर !


तुम्हारा होना भी एक उच्चारित मंत्र है

उसने कहा –

तुम्हारी कमी हो गई है… ठीक वैसे ही जैसे किसी विटामिन की कमी हो जाती है शरीर में… और होंठ फटने लगते हैं… बहुत दिन हो गये मिले हुए… मिलो अगर हो सके तो..

उसके हमसफ़र ने कहा –

सुबह की हवा
सूरज की कोमल किरणों में मैं हूं
मैं हूं तुम्हारे आसपास
अंदर सिहरन घोल देने वाली हवा में
अंगड़ाइयों में
होंठों के कोने पर बैठी मुस्कान में
पलकों का शटर बंद करने वाली नींद में
थोड़ी सी थकान और
बहुत सारी हिम्मत में
शून्य सा, विलीन सा
बार बार उच्चारित मंत्र सा


 

तुम्हारे साम्राज्य में मेरी आराम कुर्सी

उसने कहा –

क्या अब भी तुम्हें मेरे ख़्वाब आते हैं ? हम सपने के पीछे दौड़ रहे हैं.. या एक सपने को जी रहे हैं.. सच को रोज़ झाड़ते हुए ?

उसके हमसफ़र ने कहा –

तुम वही हो
जो मेरे ज़ेहन की अंगुली पकड़ के
मुझे ख़्वाबों में ले जाती हो
लम्हा दर लम्हा तुम्हारे ख्यालों के साथ
पिघलता हूं मैं

कंप्यूटर पर बैठो
तो बाहों का हार खींचता है
खाना खाता हूं
तो तुम्हारा मातृत्व सींचता है

कभी शतरंज के खानों पर लड़ते
तुम्हारे हाथ की बनी
गर्म चाय के घूंट उतारते

तो कभी एक-दूजे पर
बेफ़िक्र पड़े हम
फिल्म देखते, किताब पढ़ते
या यूं ही बतियाते

पता नहीं ये एक ख़्वाब है
या ख़्वाबों का सिलसिला
जो भी है
तुमसे है…

तुम्हारा होना
अब एक ख़्वाब हो गया है
जो समुद्र की तरह चारों तरफ नज़र आता है
किसी आराम कुर्सी पर हिचकोले लेता हुआ

© Siddharth Tripathi ✍️ SidTree

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