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जोगेंद्र नाथ मंडल : पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों वाला गुमनाम अध्याय

तारीख़ – 6 फ़रवरी 2020 : नागरिकता संशोधन कानून पर अपने तर्क देते हुए प्रधानमंत्री ने संसद में जोगेंद्र नाथ मंडल का नाम लिया… जो कि एक बड़े दलित नेता थे। पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के संदर्भ में जोगेंद्र नाथ मंडल का नाम क्यों लिया गया इस पर ज़्यादा बात नहीं हुई।
जोगेंद्र नाथ मंडल कांग्रेस से मोहभंग होने के बाद मुस्लिम लीग के साथ चले गये थे.. और लीग के एक महत्वपूर्ण नेता बन गये थे। उस दौर में जिन्ना को जोगेंद्र नाथ मंडल पर बहुत भरोसा था।

1946 में ब्रिटिश राज में अंतिम सरकार बनी तो कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने अपने प्रतिनिधियों को चुना जो कि मंत्री के तौर पर सरकार में काम करेंगे । तब मुस्लिम लीग ने जोगेंद्र नाथ मंडल का नाम भेजा। पाकिस्तान निर्माण के बाद जोगेंद्र नाथ मंडल को पाकिस्तान का कानून मंत्री बनाया गया। 1946 में जब मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन डे का आह्वान किया था.. जिसके बाद दंगे होते रहे.. बहुत बड़ी संख्या में लोग मारे गये। तब भी जोगेंद्र नाथ मंडल मुस्लिम लीग के साथ थे

जोगेंद्र नाथ मंडल ने बड़ी संख्या में दलितों को पाकिस्तान के पक्ष में झुका लिया था। उन्हें लगा था कि मुसलमानों और दलितों की सामाजिक समानता की वजह से दोनों का एक साथ आना सहज है और इस मिलन से जो राष्ट्र बनेगा वो दोनों के हितों का सम्मान करेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

पाकिस्तान निर्माण के कुछ वक्त बाद गैर मुस्लिमों को निशाना बनाया जाने लगा । मंडल का विश्वास टूटने लगा। पाकिस्तान बनने के शुरुआती दो साल में ही जोगेंद्र नाथ मंडल का दलित-मुस्लिम एकता का ख्वाब चूर चूर हो चुका था।

मार्च 1949 में मंडल ने पाकिस्तान के उस ऑब्जेक्टिव्स रेज़ोल्यूशन का भी समर्थन किया जिसमें ये कहा गया था कि पाकिस्तान की आधारशिला यूरोपीय नहीं हो सकती.. पाकिस्तान का भविष्य इस्लाम के सिद्धांतों पर ही आधारित होगा। तब पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों ने इसका विरोध किया था लेकिन उनकी चली नहीं थी।

बाद में जोगेंद्र नाथ मंडल को सत्ता के केंद्रबिंदु से दूर कर दिया गया

उनकी परिस्थिति एक सिंधी लोकोक्ति से बयां की जा सकती है

“जिनि ले मोआसी से कांदी ना थिया”

जिसका सार ये है कि आप जिन लोगों के लिए मर जाते हैं वो आपकी शोकसभा में भी नहीं आते। जिन्ना की मौत के बाद मंडल.. 8 अक्टूबर, 1950 को लियाकत अली खां के मंत्रिमंडल से त्याग पत्र देकर भारत आ गये थे। अपने त्यागपत्र में उन्होंने सामाजिक अन्याय और गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार की घटनाओं का उल्लेख किया था।

भारत आने के बाद उनका आगे का जीवन गुमनामी में बीता।

विरोधाभास ये है कि पाकिस्तान में दलित मुस्लिम गठजोड़ का प्रयोग विभाजन के तुरंत बाद ही फेल हो गया था.. लेकिन बाद में भारतीय राजनीति ने.. दलित-मुस्लिम फ़ैक्टर की आभासी चाशनी में बार बार डुबकी लगाई।

© Siddharth Tripathi ✍️ SidTree

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  1. Sindhi proverb, “Jini laey moasi, sey kandi nah thia” (You have died for them, but they won’t bother to attend your funeral).
    ये कुछ तथ्यपरक बातें हैं.. जिनमें आगे भी आप लोग चाहें तो कुछ जानकारियां जोड़ सकते हैं.. कमेंट बॉक्स में अपनी जानकारियां जोड़ेंगे तो ये बेहतर लेख बन सकेगा।

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