चाय जैसा हो गया इस बार का विमर्श
सोच के भगोने में चढ़ा
भावनाओ का पानी
पराई बातों की पत्ती
चिंता की चीनी
अदरख,काली मिर्च,
दालचीनी,तेजपत्ता,
इलायची कुटी हालातों सी
खौला,उबला, उफनाया
विचारों की छन्नी में छन कर
व्यक्तित्व के प्याले में भर गया
लोग आते रहे
पीते रहे
जीवन चाय हो गया।

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