Peak Zero : शिखर-शून्य

इसे दो भाषाओं में लिखा गया है, अंग्रेज़ी का ज़ायका अलग है, हिंदी का अलग.. लेकिन विचार का बीज एक ही है। खाद पानी, आबो-हवा का फर्क पड़ता है, पौधे और उसकी पत्तियों की रूपरेखा बदल जाती है। इस कविता का एक रेखाचित्र भी है, उम्मीद है ये प्रस्तुति आपको पसंद आएगी

Peak makes you speak
a Language not so deep
Intoxication is what mind seek
you’ve everything but can you keep ?
Fear sees through the keyhole peek
like a criminal driving fast in the jeep
Zeroes are deep
Zeroes are deep

Peak zero

शिखर क्या है ?
चुने हुए अनाम कंधों पर चढ़कर
चांद को छूना
फिर चांद को पकड़ना
और पकड़कर लटक जाना

वो शिखर जो ज़मीन से चिपके थे
उन पर पताकाएँ लहराती थीं शताब्दियों तक

आज के शिखर
आसमान से उल्टे लटके हुए दिखाई देते हैं
मानो किसी ने ध्यानाकर्षण के लिए
फाँसी लगा ली हो

परंपराओं ने हमें ऋषि दिये थे
जो हमेशा
शून्य की मुद्रा में शिखर बने रहते थे

© Siddharth Tripathi ✍️ SidTree

One Reply to “Peak Zero : शिखर-शून्य”

  1. ग़ज़ब शून्य की मुद्रा में शिखर बन जाने वाले ऋषियोँ और शून्यता के बावजूद चांद पर फांसी की तरह लटके प्रसिद्धिवानों का फ़र्क़ अद्धभुत पकड़ा है आपने। जिला दिया जय हो

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