What if Buddha wears 🎧 Headphones ? ⏯ अगर बुद्ध हेडफ़ोन पहन लें तो क्या होगा ?

इसका एक ही जवाब है – घर और दुनिया का बोध हो जाएगा। राजकुमार सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु में ही अदृश्य हेडफ़ोन पहन लिए थे, और फिर उन्होंने हर ग़ैर-ज़रूरी और पेचीदा चीज़ों/भावनाओं को सहज और सरल बना दिया। मुसीबत उन्हें म्यूज़िक सी लगने लगी। जिन अदृश्य हेडफोन्स की मैं बात कर रहा हूँ, उन्हें आप संसार के शोर में बहे बिना विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता भी कह सकते हैं। इस भाव में यात्रा तो है, लेकिन यात्रा करवाने वाली नाव के प्रति आसक्ति और मोह नहीं है।

नाव यात्रा के लिए है, उसके प्रति आसक्त होना उचित नहीं है

बुद्ध को क्रुद्ध होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वो क्रोध को हथेली पर रखे हुए अंगारों के समान बताते हैं, जिसे दूसरे पर फेंकने का इंतज़ार करते हुए क्रोधित व्यक्ति की हथेली जल जाती है। भीड़ भरे चौराहे पर, अस्तव्यस्तता के बीच, वो शांति की लाल-पीली-काली-हरी-नीली लकीरें खींच देते हैं। किसी खचाखच भरी सड़क के बीच बुद्ध का अस्तित्व पूर्णिमा के चाँद जैसा है। पूरी स्पॉटलाइट उन्हीं पर है।

कुछ साल पहले आधुनिक परिस्थितियों में बुद्ध के अंतर्मन की शक्ति को परखने की कोशिश की थी और उसी कश्मकश में ये कविता निकली।

Home vs World : घर और दुनिया

और उस योद्धा ने हथियार रख दिये
क्योंकि वो जानता था कि किसी भी युद्ध में उसकी जीत निश्चित है

चलती, फिरती, साँस लेती लाशें देखकर उसे क्रोध नहीं आता
लहू की प्यास उसे नहीं लगती, धनुष पर बाण वो नहीं चढ़ाता

इतने निरर्थक हो गये हैं युद्ध, रणभूमि में ध्यान लगा रहे हैं बुद्ध
वो ढूँढ रहे हैं घर का दरवाज़ा
जो बाहर है ही नहीं…

घर सिर्फ़ अपने अंदर है
बाहर सिर्फ़ दुनिया है

© Siddharth Tripathi ✍️ SidTree

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