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Equator : रंगभेद वाली भूमध्य रेखा

जब जातियां नहीं थीं, धर्म नहीं थे, तब भी रंगभेद था। रंग स्याह होते ही आदमी गुलाम हो जाता था। गुलामों की उधड़ी हुई पीठ आज भी कई तस्वीरों में दिखाई देती है। ज़ुल्म के ये प्रशस्ति पत्र पहले भी थे, आज भी हैं। त्वचा का रंग आज भी सपनों की कई नदियों को किसी बांध की तरह रोक लेता है। शायद काला रंग देखकर हंसने वाले, अंधेरे से डरते हैं। रंगभेद की भू-मध्य रेखा इस बार के #कविवार से होकर गुज़र रही है। इसे पढ़िए-समझिए और सारे रंगों को आपस में मिला दीजिए।

 

सूरज की लकीर हमसे होकर गुज़रती है
हमारा रंग स्याह है
हाँ, हम काले हैं
हमारी आत्मा पर छाले हैं

 

मैदान से बाहर ही रोक दिया हमें
क्यों ?
कहा – ये साले काले हैं
दफ़ा करो इन्हें, हर गेट पर ताले हैं

 

हम पर हँसने वाले अंधेरे से डर गए
देखो इन्हें तो हिम्मत के भी लाले है

 

हमारा पसीना भी बहा… तो वो सोना था…
वो गोरे, सब बेचकर ज़ेवर पहनने वाले है

 

© Siddharth Tripathi ✍️ SidTree

3 Responses to “Equator : रंगभेद वाली भूमध्य रेखा”

  1. Nikhil dubey

    बहुत ही सुंदर लिखा है
    रंग से बने सौंदर्यबोध में तो सुंदरता की पहचान के ही लाले हैं कविवार से हो कर गुज़र रही है इस बार रंग भेद की भूमध्य रेखा ये प्रयोग बड़ा नूतन है

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  2. Kuldeep

    लेकिन हमारी सोच अलग है। हमने तो कृष्ण के काले रंग को अपनाया। उस काले को भगवन बनाया। काला, कृष्ण, सबको आकर्षित करने वाला, जिसने पूरे विश्व को आलौकिक उपदेश दिया। हम काले हैं तो क्या हुआ, दिल वाले हैं।

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    • Siddharth Tripathi / *SidTree

      भगवान के संदर्भ में तो ठीक है, लेकिन मंदिर से बाहर आते ही उपदेश किनारे लगा दिए जाते हैं। असल में रंगभेद, सबसे मौलिक भेदभाव है। और इसे दूर करने के लिए जो उदारता चाहिए वो बहुत मुश्किल से मिलती है

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