Rainbow : इंद्रधनुष

सबको उड़ना था.. सबके आसमान थे.. पर किसी के पास पैर रखने के लिए ज़मीन नहीं थी… पता नहीं लोग थे.. कि गुब्बारे थे.. जिनसे हवा निकलती जा रही थी

रिश्ते का आसमान फैलता रहे.. इसके लिए…
मोहब्बत भी करनी होगी
आज़ाद भी रहना होगा
ये सोचकर जिससे भी मिला
उन सबको उड़ना था
सबके अपने आसमान थे
मेरे इन्द्रधनुष के सात रंगों का दूसरा सिरा
पैर रखना तो चाहता था
पर कहीं ज़मीन नहीं थी
क्षितिज का वो आख़िरी सिरा नहीं था
सब हवा में थे
सब उड़ रहे थे

Sharing the Time lapse of Process

© Siddharth Tripathi ✍ SidTree

3 Replies to “Rainbow : इंद्रधनुष”

  1. पतंग की तरह हम भी उड़ना चाहते हैं
    जब तक डोर से बंधे रहते हैं, आज़ादी के लिए लालायित रहते हैं
    जिस पल कट जाते हैं, आजाद होजाते हैं
    मगर ये आजादी क्षण भर की होती है
    फिर ज़मीन की तलाश, फिर बंधन की तलाश….
    शायद बंधे रहना हमें भी अच्छा लगता है
    बंधे होने प्र आज़ादी, और आजाद होने पर बंधन की तलाश
    यही जीवन है।
    यही सत्य है।
    यही इंसानी फितरत है।

  2. सब उड़ रहे हैं
    परवाज़ पर हैं
    पर इत्मीनान और
    आराम के लिए
    ऐतबार नहीं है

Comment