Same Speed : सामंजस्य

Core Thought : जब दो लोग, एक साथ चल रहे होते हैं, एक ही रफ़्तार से चल रहे होते हैं, तो उन दोनों के लिए.. समय रुक जाता है.. गति रुक जाती है। उन्हें लगता है कि कुछ आगे नहीं बढ़ रहा.. कुछ नया नहीं हो रहा.. कुछ बदल नहीं रहा। सामंजस्य को हम ठहरा हुआ और सड़ता हुआ पानी समझ लेते हैं, और यही सबसे बड़ी भूल होती है।

वो दोनों
एक साथ चल रहे थे..
एक ही रफ़्तार से..
एक दूसरे को देखते हुए..
लगातार

इस निरंतरता की भी थकान होती है
शायद इसीलिए उन्हें लगा
कि समय रुक गया
गति जम गई
कुछ नया नहीं हो रहा
कोई बदलाव और क्रांति भी नहीं
सब कुछ ठहरे हुए पानी की तरह सड़ रहा है

ठहराव की इस झुँझलाहट में
सामंजस्य की नसें काट दी गईं
कामयाबी का आकाश
उस दिन ख़ून से लाल हो गया था

© Siddharth Tripathi ✍️ SidTree

One Reply to “Same Speed : सामंजस्य”

  1. बहुत सुंदर
    हालात और देश काल की सापेक्षता में खुद के एक्शन को न समझ पाने की परेशानी।रक्तरंजित इतिहास देती है।

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