Interstellar Satire : ग्रहों के बीच बहती कटाक्ष की धूल

This is one of the my Poems from Deep Space, it has interstellar dust of mankind’s future.


प्राण वायु के बिना
क्या मेरे शब्द तुम तक पहुँचेंगे ?
क्या वहाँ तेज़ तूफानों के बीच मोमबत्ती जलाकर..
उसकी लौ में तुम्हें देखना संभव होगा ?
क्या उस लाल खुरदरी ज़मीन पर
बच्चों के सपने ठहर पाएँगे ?
वहाँ किसी दफ़्तर में क्या हम कुछ नया रचेंगे हर रोज़ ?
या फिर हमारा सृजन यही होगा
कि हर वक़्त अपनी जान बचाते रहें

एक सूखे और प्रतिकूल ग्रह पर
मनोरंजन भी कितना रक्त रंजित होगा

कभी सोचा है तुमने…
मंगल पर इंसान की छोटी सी बस्ती
पृथ्वी पर कितना बड़ा कटाक्ष होगी..


© Siddharth Tripathi  ✍️SidTree
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