Fire Fighters : बाबूजी, हम कपड़े जला रहे हैं

Every Person living below poverty line is a fire fighter
उन भूखे-निर्वस्त्र-ग़रीबों के लिए… जिन्हें कीड़ा-मकौड़ा समझकर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है !


बाहर तापमान गिरता है
मन में ठंड बढ़ती है
कई ठिठुरते हुए लोग
ख़्याल बनकर आते हैं
और अपने ही कपड़े उतारकर जलाते हैं
अलाव तापते हैं
उनकी ठंड पता नहीं क्यों मुझे भी लगती है
हमारे वातानुकूलित घोंसलों में जाड़ा ज़्यादा लगता है
ठंड में उघारे काम चला रहे हैं
बाबूजी हम कपड़े जला रहे हैं

कहने को तो सारा आकाश हमारा है
पता नहीं किस कोने में टिमटिमा रहे हैं

देखो कैसे घरों में दुबके हैं बड़े बड़े लोग
हमें ज़िंदा रहने का तरीका सिखा रहे हैं

बाहर वालों से दया की भीख ही मिलती है
हम ख़ुद अपने अंदर का सोना गला रहे हैं

ठंड में उघारे काम चला रहे हैं
बाबूजी हम कपड़े जला रहे हैं

© Siddharth Tripathi ✍️ SidTree

2 Replies to “Fire Fighters : बाबूजी, हम कपड़े जला रहे हैं”

  1. ‘उघारे’ कर दिया आपने

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