नयन बाज़ार : Real Estate Of Eyes

Hi, Kavi-Vaar by SidTree is here!
This poem talks about encroachment of eyes, dreams & intellect. Core thought is that “how commercialisation of our intellect takes place ?

दिन गुज़रते जा रहे थे
वो रोज़ छटपटा रहा था
उसकी नींद पर
अतिक्रमण होता जा रहा था
उसके सपनों के टुकड़ों पर
दुकानें बनती जा रही थी
वो ख़ुद ही सौदागर था
वो ख़ुद ही ग्राहक था
और उठती-गिरती पलकों के शटर पर
एक इश्तेहार लगा था
‘मीना बाज़ार में आपका स्वागत है
यहाँ सपने बिकते हैं’


© Siddharth Tripathi  *SidTree |  www.KavioniPad.com, 2016.

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