Smoke of Past : अतीत की आग और धुआं

क्या बीता हुआ कल…वक़्त की परतों में दबता जाता है ?
क्या वो कभी वापस नहीं आता ?
या फिर वो धुएं की तरह मन में टहलता रहता है ?
अलग-अलग आकार लेता, अलग-अलग रंग का धुआं
समय के छोटे से छोटे टुकड़े पर,
अपने पैरों के निशान छोड़ने वाला धुआं,
मिटाया तो नहीं जा सकता

ठीक उसी तरह जैसे
जूते से रगड़कर बुझाई जा रही आग
कभी पूरी तरह नही बुझती,
कुछ बाकी रह जाता है,
कभी चिंगारी,
कभी राख,
तो कभी धुएं की शक्ल में
और पसरा रहता है बहुत देर तक

माहौल में विलीन हो चुका ये धुआं
खत्म तो नहीं हो सकता
लेकिन अगर कमरे की खिड़की खोल दूं
तो वक़्त की सुलगती हुई शाख से
निकलते हुए धुएं की हैसियत
काफी कम हो जाएगी


© Siddharth Tripathi  *SidTree |  www.KavioniPad.com, 2016.

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