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Iron Man : लोहे के इंसान

Iron Man is a poem about middle class of the society, living anywhere around the world. It talks about complexity, capability & pain of being a person in middle class. They are building blocks of Society, trying to withstand pressure of a dancing crowd over their shoulders. O creator, inject some molten iron into their bones, their veins.

Molten iron

विरासत में किराये का मकान पाने वाले,
दाल, रोटी, सब्ज़ी के साथ ख़ुद आग पर खौलने वाले,
ज़िंदगी के गर्म तवे पर चिपके पैरों को उठाकर भागने वाले,
थोड़े थोड़े नोटों को जलाकर अपने अंदर की ठंड मिटाने वाले,
अपने सबसे क़ीमती समय को गिरवी रखने वाले,
और अपनी राय, अपनी पसंद को
माहौल की मिट्टी में दफ़्न करने वाले ये तमाम लोग…
एक बनते हुए मकान की बल्लियों की तरह खड़े हैं

इनके मध्य वर्गीय कंधों पर
एक खाती-पीती और नाचती हुई भीड़ का बोझ है
और बड़े बड़े लोगों की ये भीड़ रोज़ बढ़ती जा रही है
शायद मध्य वर्ग में
पिघला हुआ लोहा भरने का वक़्त अब आ गया है

 

© Siddharth Tripathi ✍️ SidTree

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2 Responses to “Iron Man : लोहे के इंसान”

  1. nikidubes

    मैंने उसको 
    जब-जब देखा 
    लोहा देखा 
    लोहे जैसा- 
    तपते देखा- 
    गलते देखा- 
    ढलते देखा 
    मैंने उसको 
    गोली जैसा 
    चलते देखा। 
    कवि केदारनाथ अग्रवाल

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    Reply
  2. राजेश

    आग, आग और जिंदा रहने की जिद
    लिखवाती हैं जिंदगी

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    Reply

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