Paper Flowers : वक़्त की माँग हैं काग़ज़ के फूल

Dedicated to all those Office spaces, which need to encourage more originality & Human touch.

अकड़ी हुई बुनियादों पर खड़े कॉन्क्रीट के दफ़्तर में
एक मेज़ रखी है
मेज़ पर तरह तरह के फूल हैं
और मेज़ पर रखे ये फूल मुरझा भी जाएँ तो हटाने का मन नहीं करता
क़ुदरत से जुड़ी असली चीज़ों की बहुत कमी है यहाँ
आस पास देखिए
पेड़ कट कर मेज़ बन गया है
फूल कटकर गुलदस्ता बन गए हैं
और तमाम इंसान कटकर मुलाजिम बन गए हैं
सूरज न तो उगता है, और न ही डूबता है यहाँ
ट्यूबलाइट की रोशनी में झुलसते
गुलाबी, पीले फूल अक्सर दिख जाते है
फिर लगता है कि हर जगह की मिट्टी मुलायम तो नहीं हो सकती
हर जगह फूल जड़ों के साथ ज़िंदा तो नहीं रह सकते
इसलिए यहाँ असली नहीं काग़ज़ के फूलों की ज़रूरत है
जिनको मुरझा जाने का ख़तरा न हो
जिनकी कोई महक न हो
और जिन्हें सूरज, हवा, खाद, पानी की ज़रूरत न हो

© Siddharth Tripathi 

One Reply to “Paper Flowers : वक़्त की माँग हैं काग़ज़ के फूल”

  1. Absolutely right sir & definitely office spaces need to encourage more originality & human touch. I believe office is also our second home where we spend 8-9 hours of day and some time more than that ( when closing time comes 31 March)☺😊 a place where we learn & earn so we should keep our office environment positive and clean. Nicely written sir..!!👍👍

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