आज सच थोड़ा ज़्यादा हो गया : Truth Hurts

This is a thought on compromises made during quest for Success !

एकलव्य ने तो अँगूठा दिया था,
यहाँ क़ौम दोनों हाथ कटाए बैठी है

बिना हाथ वाले धड़ की गर्दन
झुकते झुकते ज़माने के पैरों तक कब पहुँच जाती है
पता ही नहीं चलता

गर्दन पैरों पर, नाक जूतों पर
और नाक पर तो बारूद भी नहीं होता
कि रगड़ने पर जल जाए

कुछ जूतों की चमक के लिए
भीड़ नाक रगड़ रही है

सवाल है कि आग कब लगेगी ?

ये सोचते सोचते
हिंदुस्तान गलकर आधा हो गया
आज सच थोड़ा ज़्यादा हो गया

© Siddharth Tripathi and www.KavioniPad.com, 2015

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